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| आत्म नभर भारत |
MR. JAYENDRA BARAD
PRINCIPAL,
PODAR INTERNATIONAL SCHOOL
VERAVAL
हम न क ह कार य ललकार ह य यद्ध घोष,
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कण कण जन जन हर मन हर तन, जन जीवन और उ ान वन,
सब न क ह गहार य, रग रग म दौड़ प्रबद्ध जोश
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सबक स्वणम पकार ह, आत्म नभर भारत अमर ह! ै
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आत्म नभर ह मत्र अमर, स्वाधीनता क सत अज़र,
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डक क चोट टकार कर, लाया ह हमन प्रण पगभर,
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माता, बालक, पता, पालक हर एक जन नक्षत्र नगर,
सबका सकल्प साफ़ ह, आत्म नभर भारत आज ह! ै
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जो अब तक मद म थ, अजय समझत आततायी थ, े
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बढ़त थ कदम बर, मा भारती क और चढ़,
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राखी क रणकार सन, कर आरती सरहद पार कर,
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प्र तवास क लए अब आश ह, आत्म नभर भारत अगाध ह! ै
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य तो अभी अगड़ाई ह, आत्म नभरता क बद सफ दखलाई ह, ै
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जन जाग रहा पराया त्याग रहा लम्बी यह लड़ाई ह, ै
भारतवष का इ तहास रहा, तजस दव्य र म भरा,
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अब अडमान रहा ना अगम्य ह, आत्म नभर भारत अदम्य ह! ै
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अभीकाक्षा जो आत्मरक्षा क , क ह हर जन न भारत भर म,
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उभरगी ज्वाला बनकर, हर नारी नर क तन मन म,
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उठनवाली हर चगारी सश करण स्वमान वाली,
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इ तहास स्व णम अचल ह, आत्म नभर भारत अटल ह! ै
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आनद क बला आई ह, अगणत अवसर लाई ह, ै
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भारत मा क हर ब न ली यह भीष्मप्र त ा ह, ै
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हम जीतग हम जीतग बस यही लहर प्राणदायी ह, ै
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वश्व वधाता पयत ह, आत्म नभर भारत अनत ह! ै
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न रुका था भारतवष कभी, न झका सनातन सर कभी,
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अपनी मस्ती म आज ह, अपन क लए आ दकाल ह,
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प्रत्यक्ष परोक्ष प्र तपल प्र तडग प्रचड य प्र त ा ह,
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आसमान स ऊची सोच, आत्म नभर भारत अतल्य ह! ै
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