Page 17 - 4.4 Abhivyakti
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| आत्म नभर भारत |







                                                                          MR. JAYENDRA BARAD
                                                                                 PRINCIPAL,
                                                                  PODAR INTERNATIONAL SCHOOL
                                                                                   VERAVAL





                 हम न क  ह  कार य ललकार ह य यद्ध घोष,
                              ं
                      े
                            ै
                                                 े
                                                    ु
                                    े
                                               ै
        कण कण जन जन हर मन हर तन, जन जीवन और उ ान वन,
               सब न क  ह गहार य, रग रग म दौड़ प्रबद्ध जोश
                     े
                             ु
                           ै
                                   े
                                                 े
                                                     ु

              सबक  स्वणम पकार ह, आत्म नभर भारत अमर ह!         ै

                                   ै
                             ु

                                                              आत्म नभर ह मत्र अमर, स्वाधीनता क सत अज़र,
                                                                             ं
                                                                                                 े
                                                                                                     ू
                                                                          ै

                                                             डक क  चोट टकार कर, लाया ह हमन प्रण पगभर,
                                                                े
                                                                                                 े
                                                                                            ै
                                                                           ं
                                                               ं
                                                             माता, बालक, पता, पालक हर एक जन नक्षत्र नगर,
                                                             सबका सकल्प साफ़ ह, आत्म नभर भारत आज ह!           ै
                                                                      ं
                                                                                  ै

              जो अब तक मद म थ, अजय समझत आततायी थ,             े

                                  े
                                                  े
                  बढ़त थ कदम बर, मा भारती क  और चढ़,
                                                          े
                                   े
                       े
                                       ँ
                                  ु
                         े
               राखी क  रणकार सन, कर आरती सरहद पार कर,
                                        े
                                 ु
          प्र तवास क  लए अब आश ह, आत्म नभर भारत अगाध ह!           ै
                                      ै
                     े

                                                    य तो अभी अगड़ाई ह, आत्म नभरता क  बद  सफ  दखलाई ह,           ै
                                                                         ै
                                                      े
                                                                 ं
                                                                                             ूं


                                                          जन जाग रहा पराया त्याग रहा लम्बी यह लड़ाई ह,    ै
                                                          भारतवष का इ तहास रहा, तजस  दव्य र  म भरा,
                                                                                      े

                                                      अब अडमान रहा ना अगम्य ह, आत्म नभर भारत अदम्य ह!        ै
                                                            ं
                                                                                  ै

          अभीकाक्षा जो आत्मरक्षा क , क  ह हर जन न भारत भर म,
                  ं
                                            े
                                                      े
               उभरगी ज्वाला बनकर, हर नारी नर क तन मन म,
                    े
                                                  े
               उठनवाली हर  चगारी सश  करण स्वमान वाली,
                    े

             इ तहास स्व णम अचल ह, आत्म नभर भारत अटल ह!         ै
                                     ै


                                                                आनद क  बला आई ह, अगणत अवसर लाई ह,           ै
                                                                            े
                                                                    ं
                                                                                     ै
                                                                भारत मा क हर ब  न ली यह भीष्मप्र त ा ह,     ै
                                                                           े
                                                                                      े
                                                                                    े
                                                                         ँ
                                                               हम जीतग हम जीतग बस यही लहर प्राणदायी ह,       ै

                                                                                    े
                                                                         े

                                                                वश्व वधाता पयत ह, आत्म नभर भारत अनत ह!       ै
                                                                                  ै


                                                                                                         ं
              न रुका था भारतवष कभी, न झका सनातन सर कभी,
                                                          ु
                                            ु

              अपनी मस्ती म आज ह, अपन  क  लए आ दकाल ह,


                                              े

                प्रत्यक्ष परोक्ष प्र तपल प्र तडग प्रचड य प्र त ा ह,
                                                     े
                                                              ै
                                                 ं
               आसमान स ऊची सोच, आत्म नभर भारत अतल्य ह!          ै
                                                           ु
                            ँ

                          े
                                                           13
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